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उड़द

उड़द का पत्ती मरोड़ रोग

उड़द का पत्ती मरोड़ या लीफ क्रिंकल रोग एक महत्वपूर्ण विषाणुजनित बीमारी है। इसे Urdbean Leaf Crinkle Disease भी कहा जाता है। रोग विशेष रूप से नई पत्तियों और पौधे की बढ़वार को प्रभावित करता है। जल्दी संक्रमण होने पर पौधा बौना रह जाता है, पत्तियां मुड़ जाती हैं और फूल बनने में देरी हो सकती है। गंभीर अवस्था में पौधे की उत्पादकता बहुत कम हो जाती है। TNAU के अनुसार रोग में नई पत्तियों पर शिराओं के आसपास पीलापन, किनारों का नीचे की ओर मुड़ना और पत्तियों का मरोड़ना प्रमुख लक्षण हैं।

उड़द का पत्ती मरोड़ या लीफ क्रिंकल रोग एक महत्वपूर्ण विषाणुजनित बीमारी है। इसे Urdbean Leaf Crinkle Disease भी कहा जाता है। रोग विशेष रूप से नई पत्तियों और पौधे की बढ़वार को प्रभावित करता है। जल्दी संक्रमण होने पर पौधा बौना रह जाता है, पत्तियां मुड़ जाती हैं और फूल बनने में देरी हो सकती है। गंभीर अवस्था में पौधे की उत्पादकता बहुत कम हो जाती है। TNAU के अनुसार रोग में नई पत्तियों पर शिराओं के आसपास पीलापन, किनारों का नीचे की ओर मुड़ना और पत्तियों का मरोड़ना प्रमुख लक्षण हैं।

कारण

यह रोग Urdbean Leaf Crinkle Virus (ULCV) से संबंधित माना जाता है।

रोग का प्रसार कई रास्तों से हो सकता है। संक्रमित बीज रोग के प्राथमिक स्रोतों में शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा संक्रमित पौधे के रस के संपर्क से भी रोग फैल सकता है।

TNAU के अनुसार सफेद मक्खी Bemisia tabaci तथा कुछ माहू प्रजातियां जैसे Aphis craccivora और Aphis gossypii भी रोग प्रसार में भूमिका निभा सकती हैं।

संक्रमित उड़द, कुछ अन्य दलहनी पौधे और खरपतवार वायरस को एक मौसम से दूसरे मौसम तक बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

गर्म मौसम में वाहक कीटों की संख्या बढ़ने से बीमारी का प्रसार तेज हो सकता है।

लक्षण

सबसे पहले नई और ऊपर की पत्तियों में लक्षण दिखाई देते हैं।

पत्ती की छोटी शिराओं तथा उनके आसपास हल्का पीलापन दिखाई दे सकता है।

बाद में पत्ती के किनारे नीचे की ओर मुड़ने लगते हैं।

पत्तियां सिकुड़ी हुई, मरोड़ी हुई या झुर्रीदार दिखाई देती हैं।

कुछ पत्तियां मोटी और सामान्य से गहरे हरे रंग की हो सकती हैं।

पत्ती की निचली सतह पर शिराओं में लाल-भूरा रंग विकसित हो सकता है और यह रंग पत्ती डंठल तक फैल सकता है।

संक्रमित पौधों में गांठों के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे पौधा बौना और झाड़ीदार दिखाई देता है।

फूल आने में देरी हो सकती है तथा फूल की कलियां विकृत हो सकती हैं।

TNAU के अनुसार बुवाई के लगभग पांच सप्ताह के अंदर संक्रमित पौधों में बौनापन गंभीर हो सकता है और कुछ पौधे शीर्ष ऊतक के मरने के कारण नष्ट भी हो सकते हैं।

देर से संक्रमित पौधों में मरोड़ कम गंभीर हो सकता है लेकिन पत्तियों की शिराओं के आसपास स्पष्ट पीलापन बना रहता है।

निदान

नई पत्तियों का झुर्रीदार होना, किनारों का मुड़ना और पौधे का बौना रहना रोग के प्रमुख संकेत हैं।

इसे पीला मोजेक से अलग पहचानना जरूरी है। पीला मोजेक में पत्तियों पर चमकीला पीला-हरा चितकबरा पैटर्न बनता है, जबकि लीफ क्रिंकल में मरोड़, सिकुड़न और शिराओं से जुड़ा पीलापन अधिक महत्वपूर्ण होता है।

थ्रिप्स या अन्य रस चूसने वाले कीट भी पत्तियों को विकृत कर सकते हैं, इसलिए कीटों की प्रत्यक्ष उपस्थिति की जांच करें।

सटीक वायरस पहचान के लिए प्रयोगशाला परीक्षण की आवश्यकता हो सकती है।

उपाय

प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें। ICAR-IIPR की IPU 17-1, IPU 19-10, IPU 17-2 और IPU 13-6 जैसी कुछ उड़द किस्मों में ULCV या लीफ क्रिंकल/लीफ कर्ल के प्रति प्रतिरोध दर्ज है।

स्वस्थ और प्रमाणित बीज लगाएं।

खेत की शुरुआती अवस्था में नियमित निरीक्षण करें और रोगग्रस्त पौधों को लगभग 40–45 दिन तक समय रहते निकालते रहें। TNAU भी संक्रमित पौधों को शुरुआती अवस्था में हटाने की सलाह देता है।

खेत और मेड़ों से खरपतवार तथा वैकल्पिक मेजबान पौधों को हटाएं।

वाहक कीटों की निगरानी करें और जरूरत पड़ने पर स्थानीय कृषि विभाग की वर्तमान अनुशंसा के अनुसार नियंत्रण करें।

वायरस रोग होने के कारण रोगग्रस्त पौधे को ठीक करने वाला कोई सामान्य फफूंदनाशी नहीं है। रोकथाम और वाहक नियंत्रण ही अधिक प्रभावी हैं।