ज्वार का चारकोल सड़न, जिसे चारकोल रॉट भी कहा जाता है, मुख्य रूप से जड़ और तने को प्रभावित करने वाला गंभीर रोग है। यह गर्म और सूखी परिस्थितियों में अधिक नुकसान करता है और विशेषकर रबी ज्वार या ऐसी फसल में गंभीर हो सकता है जो दाना भरने के समय पानी की कमी से तनाव में हो। रोगग्रस्त तने के अंदर बड़ी संख्या में छोटे काले बिंदु बनने के कारण प्रभावित ऊतक कोयले या चारकोल जैसा दिखाई देता है।
कारण
यह रोग मुख्य रूप से Macrophomina phaseolina नामक फफूंद के कारण होता है।
यह रोगजनक मिट्टी और संक्रमित फसल अवशेषों में छोटे काले माइक्रोस्क्लेरोशिया के रूप में लंबे समय तक जीवित रह सकता है।
उच्च तापमान और मिट्टी में नमी की कमी रोग के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियां हैं।
विशेष रूप से फूल आने और दाना भरने के दौरान सूखे का तनाव होने पर पौधे कमजोर हो जाते हैं और संक्रमण तेजी से बढ़ता है।
अत्यधिक पौध संख्या, कमजोर जड़ विकास और असंतुलित पोषण रोग की गंभीरता बढ़ा सकते हैं।
लक्षण
रोग सामान्यतः फसल के बाद के चरण में स्पष्ट दिखाई देता है।
संक्रमित पौधे समय से पहले सूखने लगते हैं और खेत में जल्दी पकते हुए दिखाई दे सकते हैं।
निचली पत्तियां पहले पीली पड़ती हैं और बाद में पूरा पौधा सूख सकता है।
तने का निचला भाग कमजोर हो जाता है और पौधे आसानी से गिर सकते हैं।
तने को चीरने पर अंदर का पिथ विघटित, सूखा और रेशेदार दिखाई देता है।
तने के अंदर बड़ी संख्या में छोटे काले बिंदु दिखाई देते हैं। यही माइक्रोस्क्लेरोशिया होते हैं।
इन काले बिंदुओं के कारण तने का अंदरूनी भाग ऐसा दिखाई देता है जैसे उस पर बारीक कोयले का चूर्ण लगा हो।
जड़ें भी काली, कमजोर और सड़ी हुई दिखाई दे सकती हैं।
गंभीर संक्रमण में पौधा भुट्टे या बाली का वजन सहन नहीं कर पाता और तना टूट सकता है।
निदान
चारकोल रॉट की पहचान के लिए समय से पहले सूखते पौधे के निचले तने को चीरकर देखें।
यदि अंदर का पिथ नष्ट हो चुका है और बड़ी संख्या में बहुत छोटे काले बिंदु दिखाई दे रहे हैं, तो चारकोल रॉट की संभावना अधिक है।
इसे सामान्य तना सड़न से अलग पहचानना जरूरी है। चारकोल रॉट में काले माइक्रोस्क्लेरोशिया सबसे महत्वपूर्ण संकेत हैं।
सूखे और गर्म मौसम में इस प्रकार के लक्षण दिखाई देना निदान को और मजबूत करता है।
उपाय
फूल आने और दाना भरने के दौरान पौधों को गंभीर पानी की कमी से बचाना चारकोल रॉट प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।
जहां सिंचाई उपलब्ध हो, महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर समय पर सिंचाई करें।
अनुशंसित पौध संख्या बनाए रखें। बहुत घनी फसल में पौधों के बीच पानी के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
रोग प्रतिरोधी या सहनशील ज्वार किस्मों का उपयोग करें।
संतुलित उर्वरक दें और विशेषकर पोटाश की कमी न होने दें।
मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने से जलधारण क्षमता और जड़ स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है।
संक्रमित फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करें और लगातार संवेदनशील फसलें उगाने से बचें।
फसल चक्र अपनाना उपयोगी हो सकता है, हालांकि Macrophomina phaseolina के कई मेजबान होने के कारण केवल फसल चक्र पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
चारकोल रॉट में रोग दिखाई देने के बाद फफूंदनाशी से नियंत्रण सीमित हो सकता है। इसलिए सूखे के तनाव से बचाव, सहनशील किस्म, उचित पौध संख्या और संतुलित पोषण सबसे प्रभावी उपाय हैं।