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बाजरा

बाजरा का अर्गट रोग

बाजरा का अर्गट रोग मुख्य रूप से बाली और फूलों को प्रभावित करने वाला गंभीर फफूंदजनित रोग है। यह रोग केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि अनाज की गुणवत्ता के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संक्रमित दानों की जगह फफूंद की कठोर संरचनाएं बन सकती हैं। बीज उत्पादन वाले खेतों में इसका विशेष महत्व है। रोग का शुरुआती प्रमुख लक्षण बालियों से चिपचिपे मधुरस जैसे पदार्थ का निकलना है, इसलिए इसकी प्रारंभिक अवस्था को कई बार हनीड्यू अवस्था कहा जाता है।

बाजरा का अर्गट रोग मुख्य रूप से बाली और फूलों को प्रभावित करने वाला गंभीर फफूंदजनित रोग है। यह रोग केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि अनाज की गुणवत्ता के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संक्रमित दानों की जगह फफूंद की कठोर संरचनाएं बन सकती हैं। बीज उत्पादन वाले खेतों में इसका विशेष महत्व है। रोग का शुरुआती प्रमुख लक्षण बालियों से चिपचिपे मधुरस जैसे पदार्थ का निकलना है, इसलिए इसकी प्रारंभिक अवस्था को कई बार हनीड्यू अवस्था कहा जाता है।

कारण

बाजरा का अर्गट रोग मुख्य रूप से Claviceps fusiformis नामक फफूंद के कारण होता है।

रोगजनक संक्रमित बालियों में सामान्य दाने की जगह कठोर, गहरे रंग की संरचनाएं बनाता है जिन्हें स्क्लेरोशिया कहा जाता है। ये स्क्लेरोशिया संक्रमित अनाज के साथ या खेत में गिरकर अगले मौसम के लिए रोग का स्रोत बन सकते हैं।

अनुकूल परिस्थितियों में इनसे संक्रमणकारी बीजाणु बनते हैं, जो बाजरा में फूल आने के समय खुले हुए फूलों को संक्रमित करते हैं।

फूल आने के समय अधिक आर्द्रता, हल्की वर्षा, बादल वाला मौसम और लंबे समय तक नमी रोग के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं।

जिन खेतों में फूल आने की अवधि बहुत लंबी हो या परागण कमजोर हो, वहां खुले फूल लंबे समय तक संक्रमण के प्रति संवेदनशील रह सकते हैं।

लक्षण

रोग का सबसे पहला स्पष्ट लक्षण बालियों पर दिखाई देता है।

फूल आने के समय संक्रमित फूलों से हल्के गुलाबी, पारदर्शी या भूरे रंग का चिपचिपा और मीठा तरल पदार्थ निकलने लगता है। इसे हनीड्यू कहा जाता है।

यह चिपचिपा तरल बाली पर बूंदों के रूप में दिखाई देता है। कभी-कभी इसकी मात्रा इतनी अधिक होती है कि बाली चिपचिपी हो जाती है और उस पर मिट्टी, धूल या छोटे कीट चिपकने लगते हैं।

हनीड्यू में बड़ी संख्या में फफूंद के बीजाणु होते हैं। वर्षा की छींटों और कीटों के संपर्क से ये दूसरे फूलों तक पहुंच सकते हैं।

बाद की अवस्था में संक्रमित फूल में सामान्य दाना बनने के बजाय लंबी या अनियमित कठोर संरचना विकसित होती है। शुरू में यह हल्की हो सकती है लेकिन पकने पर गहरे भूरे या काले रंग की हो जाती है।

इन्हीं संरचनाओं को अर्गट स्क्लेरोशिया कहा जाता है। अधिक प्रकोप होने पर एक ही बाली में बड़ी संख्या में दानों की जगह स्क्लेरोशिया बन सकते हैं।

निदान

फूल आने की अवस्था में बालियों का निरीक्षण अर्गट की पहचान का सबसे प्रभावी तरीका है।

यदि फूलों से शहद या गोंद जैसा चिपचिपा तरल निकल रहा है तो अर्गट की संभावना मजबूत होती है।

फसल पकने पर सामान्य बाजरा दानों के बीच लंबी, कठोर और गहरे रंग की संरचनाओं को देखकर रोग की पहचान की जा सकती है।

इसे कंडुआ से अलग पहचानना जरूरी है। कंडुआ रोग में प्रभावित दाने के अंदर काले बीजाणुओं का चूर्ण बनता है, जबकि अर्गट में सामान्य दाने की जगह ठोस और कठोर स्क्लेरोशियम बनता है।

उपाय

स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें। संक्रमित बीज लॉट में मौजूद अर्गट स्क्लेरोशिया को बुवाई से पहले अलग करना जरूरी है।

गहरी गर्मी की जुताई करने से मिट्टी में पड़े स्क्लेरोशिया गहराई में दब सकते हैं और रोगजनक का स्रोत कम करने में मदद मिल सकती है।

खेत में पिछले वर्ष के स्वयं उगे बाजरा के पौधे और रोगग्रस्त अवशेष हटाएं।

फूल आने के समय खेत की नियमित निगरानी करें। रोगग्रस्त बालियां दिखाई देने पर उन्हें सावधानी से निकालकर नष्ट करना छोटे खेतों और बीज उत्पादन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है।

अच्छे और समान परागण को बढ़ावा देने वाली कृषि पद्धतियां अपनाएं, क्योंकि तेजी से निषेचित फूल रोग के प्रति कम समय तक संवेदनशील रहते हैं।

रोगरोधी या सहनशील किस्मों को प्राथमिकता दें। ICAR-AICRP बाजरा कार्यक्रम में अर्गट सहित कई रोगों के प्रति प्रतिरोधी जर्मप्लाज्म और किस्मों की पहचान की जाती रही है।

रोग का इतिहास अधिक होने पर फूल आने की संवेदनशील अवधि में स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित पंजीकृत फफूंदनाशी की आवश्यकता पड़ सकती है। उपयोग से पहले उत्पाद लेबल और वर्तमान क्षेत्रीय अनुशंसा अवश्य देखें।