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अरहर / तूर

अरहर का फाइटोफ्थोरा झुलसा

अरहर का फाइटोफ्थोरा झुलसा विशेष रूप से अधिक वर्षा, जलभराव और खराब जल निकास वाले खेतों में गंभीर होने वाला रोग है। यह पौधे के तने, शाखाओं और जड़ों को प्रभावित कर सकता है। रोग तेजी से बढ़ने पर पौधे अचानक मुरझाकर मर सकते हैं। ICRISAT के अनुसार यह रोग खास तौर पर उन स्थितियों में बढ़ता है जहां अरहर की फसल जलभराव का सामना करती है।

अरहर का फाइटोफ्थोरा झुलसा विशेष रूप से अधिक वर्षा, जलभराव और खराब जल निकास वाले खेतों में गंभीर होने वाला रोग है। यह पौधे के तने, शाखाओं और जड़ों को प्रभावित कर सकता है। रोग तेजी से बढ़ने पर पौधे अचानक मुरझाकर मर सकते हैं। ICRISAT के अनुसार यह रोग खास तौर पर उन स्थितियों में बढ़ता है जहां अरहर की फसल जलभराव का सामना करती है।

कारण

यह रोग मुख्य रूप से Phytophthora drechsleri f. sp. cajani से संबंधित रोगजनक के कारण होता है।

यह मिट्टी और संक्रमित फसल अवशेषों में जीवित रह सकता है।

अधिक वर्षा के समय खेत में पानी भरने से रोगजनक तेजी से सक्रिय होता है। पानी के माध्यम से इसके संक्रमणकारी भाग स्वस्थ पौधों तक पहुंच सकते हैं।

खराब जल निकास, निचले खेत, लगातार वर्षा और बहुत घनी फसल रोग की गंभीरता बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।

अधिक पौध संख्या के कारण कैनोपी के अंदर नमी अधिक बनी रह सकती है, जिससे रोग का संक्रमण बढ़ सकता है। ICRISAT ने भी अधिक पौध संख्या और तेजी से विकसित घनी कैनोपी को फाइटोफ्थोरा झुलसा के बढ़ने से जोड़ा है।

लक्षण

रोग छोटे पौधों से लेकर फूल वाली अवस्था तक दिखाई दे सकता है।

शुरुआत में तने के निचले हिस्से पर गहरे भूरे या पानी में भीगे हुए धब्बे बनते हैं।

ये धब्बे तेजी से आकार में बढ़ते हैं और तने को चारों ओर से घेर सकते हैं।

संक्रमित भाग दबा हुआ, सिकुड़ा हुआ और भूरा दिखाई दे सकता है।

जब संक्रमण तने को पूरी तरह घेर लेता है तो ऊपर का हिस्सा अचानक मुरझाकर सूखने लगता है।

गंभीर संक्रमण में तना कमजोर होकर संक्रमित स्थान से टूट सकता है।

छोटे पौधे बहुत तेजी से मर सकते हैं और खेत में पौध संख्या कम हो सकती है।

खेत में रोग अक्सर निचले या पानी जमा होने वाले स्थानों पर पैच के रूप में अधिक दिखाई देता है।

जड़ों में भी सड़न हो सकती है, लेकिन तने पर पानी में भीगा हुआ बड़ा घाव रोग की महत्वपूर्ण पहचान है।

निदान

फाइटोफ्थोरा झुलसा की पहचान के लिए तने के आधार और निचले हिस्से की जांच करें।

यदि तने पर बड़ा, पानी में भीगा हुआ, भूरा और सिकुड़ा हुआ घाव दिखाई दे रहा है तथा पौधा उसके ऊपर से मुरझा रहा है तो रोग की संभावना अधिक है।

खेत में हाल ही में भारी वर्षा या जलभराव हुआ हो तो निदान और मजबूत होता है।

इसे फ्यूजेरियम उकठा से अलग पहचानना जरूरी है। उकठा में तने के अंदर संवहनी ऊतक भूरे हो जाते हैं, जबकि फाइटोफ्थोरा में बाहर की तरफ स्पष्ट पानी में भीगा हुआ तना घाव बनता है।

उपाय

ऐसे खेत का चयन करें जहां पानी का निकास अच्छा हो। निचले और बार-बार जलभराव वाले खेतों में अरहर लगाने से बचें।

ऊंची क्यारी, रिज या मेड़ पर बुवाई करने से अतिरिक्त पानी जल्दी निकल सकता है। ICRISAT भी अच्छी जल निकासी और उठी हुई क्यारियों को फाइटोफ्थोरा प्रबंधन में महत्वपूर्ण बताता है।

अनुशंसित पौध दूरी रखें और अत्यधिक घनी फसल से बचें।

रोगमुक्त और प्रमाणित बीज का उपयोग करें।

जहां उपलब्ध हों वहां फाइटोफ्थोरा के प्रति सहनशील या प्रतिरोधी अरहर किस्में लगाएं।

संक्रमित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट करें।

अत्यधिक बारिश के बाद खेत में जमा पानी को तुरंत बाहर निकालने की व्यवस्था करें।

रोग के इतिहास वाले क्षेत्रों में स्थानीय कृषि विभाग की वर्तमान अनुशंसा के अनुसार बीज उपचार और आवश्यकता आधारित पंजीकृत फफूंदनाशी का उपयोग किया जा सकता है।

पुराने ICRISAT प्रबंधन दस्तावेजों में मेटालेक्सिल आधारित उपचारों का उल्लेख मिलता है, लेकिन वर्तमान उपयोग के लिए केवल पंजीकृत उत्पाद, अनुमोदित मात्रा और वर्तमान लेबल निर्देश का पालन करें।

इस रोग में सबसे महत्वपूर्ण उपाय जल निकास है। जलभराव नियंत्रित किए बिना केवल रासायनिक उपचार पर निर्भर रहना प्रभावी रणनीति नहीं है।