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गेहूं

गेहूं का पीला रतुआ रोग

गेहूं का पीला रतुआ, जिसे येलो रस्ट या स्ट्राइप रस्ट भी कहा जाता है, रबी मौसम में गेहूं की गंभीर बीमारियों में से एक है। ठंडे और नम मौसम में यह तेजी से फैल सकता है। यदि रोग समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता घट जाती है और दानों का भराव प्रभावित हो सकता है।

गेहूं का पीला रतुआ, जिसे येलो रस्ट या स्ट्राइप रस्ट भी कहा जाता है, रबी मौसम में गेहूं की गंभीर बीमारियों में से एक है। ठंडे और नम मौसम में यह तेजी से फैल सकता है। यदि रोग समय रहते नियंत्रित न किया जाए तो पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता घट जाती है और दानों का भराव प्रभावित हो सकता है।

कारण

पीला रतुआ मुख्य रूप से Puccinia striiformis नामक फफूंद के कारण होता है। यह रोग विशेष रूप से ठंडे और नम मौसम में तेजी से बढ़ता है। अधिक ओस, कोहरा, हल्की बारिश और लंबे समय तक पत्तियों का गीला रहना इसके लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं।

रोग के बीजाणु हवा के माध्यम से लंबी दूरी तक फैल सकते हैं। इसलिए एक खेत में संक्रमण होने पर आसपास के खेतों में भी रोग तेजी से पहुंच सकता है।

संवेदनशील किस्मों की खेती, बहुत घनी फसल और अधिक नाइट्रोजन का उपयोग रोग की गंभीरता बढ़ा सकता है।

लक्षण

इस रोग की सबसे खास पहचान पत्तियों पर बनने वाली पीले रंग की लंबी धारियां हैं।

शुरुआत में पत्तियों पर छोटे पीले बिंदु दिखाई देते हैं। बाद में ये बिंदु एक सीधी पंक्ति में जुड़ जाते हैं और पत्ती की लंबाई के समानांतर पीली धारियां बनने लगती हैं।

इन धारियों पर पीले या नारंगी रंग का महीन पाउडर दिखाई देता है। हाथ या कपड़ा लगाने पर यह पाउडर आसानी से निकल सकता है।

गंभीर संक्रमण होने पर पूरी पत्ती पीली पड़ सकती है और जल्दी सूख सकती है। कभी-कभी रोग पत्ती आवरण और बालियों के हिस्सों तक भी पहुंच सकता है।

यदि संक्रमण बालियां बनने से पहले हो जाए तो दानों का आकार छोटा रह सकता है और उनका वजन कम हो सकता है।

निदान

पीला रतुआ पहचानने का सबसे आसान तरीका पत्तियों पर बनी पीली धारियों को देखना है।

इन धारियों में पीले बीजाणु सीधी कतारों में होते हैं, जबकि भूरा रतुआ में भूरे धब्बे पत्ती पर अनियमित रूप से बिखरे रहते हैं।

यदि पत्तियों पर केवल समान रूप से पीलापन है और पाउडर जैसी संरचना नहीं है, तो पोषक तत्व की कमी की भी जांच करनी चाहिए।

सुबह के समय खेत का निरीक्षण करना उपयोगी रहता है, क्योंकि ओस में लक्षण अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं।

उपाय

सबसे प्रभावी उपाय प्रतिरोधी या सहनशील गेहूं किस्मों का चयन है। अपने क्षेत्र के कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित किस्मों को प्राथमिकता दें।

समय पर बुवाई करें। बहुत देर से बोई गई गेहूं की फसल कई क्षेत्रों में रतुआ रोग के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है।

खेत में जरूरत से अधिक नाइट्रोजन का प्रयोग न करें। संतुलित उर्वरक उपयोग करें और पोटाश सहित अन्य पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में दें।

रोग दिखाई देते ही खेत की नियमित निगरानी करें। शुरुआती अवस्था में संक्रमित भागों को पहचानना नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।

रोग बढ़ने की स्थिति में कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित पंजीकृत फफूंदनाशी का छिड़काव किया जा सकता है। ट्रायाजोल समूह के कुछ फफूंदनाशी रतुआ रोगों के प्रबंधन में उपयोग किए जाते हैं, लेकिन सही दवा और मात्रा क्षेत्रीय अनुशंसा के अनुसार ही चुनें।

समय पर पहचान, प्रतिरोधी किस्म और संतुलित पोषण पीला रतुआ नियंत्रण की मुख्य रणनीति है।