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गेहूं

गेहूं का करनाल बंट

करनाल बंट गेहूं का महत्वपूर्ण फफूंदजनित रोग है, जिसका पहला वैज्ञानिक विवरण भारत के करनाल क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण इसे यह नाम मिला। यह रोग आमतौर पर पूरी बाली को नष्ट नहीं करता, बल्कि कुछ दानों के हिस्से को प्रभावित करता है। अनाज की गुणवत्ता और व्यापारिक मूल्य पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

करनाल बंट गेहूं का महत्वपूर्ण फफूंदजनित रोग है, जिसका पहला वैज्ञानिक विवरण भारत के करनाल क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण इसे यह नाम मिला। यह रोग आमतौर पर पूरी बाली को नष्ट नहीं करता, बल्कि कुछ दानों के हिस्से को प्रभावित करता है। अनाज की गुणवत्ता और व्यापारिक मूल्य पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

कारण

करनाल बंट मुख्य रूप से Tilletia indica नामक फफूंद के कारण होता है।

रोगजनक के बीजाणु मिट्टी और संक्रमित दानों में कई वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।

बाली निकलने और फूल आने के समय ठंडा, नम और बादल वाला मौसम संक्रमण के लिए बहुत अनुकूल होता है।

बारिश, ओस और अधिक आर्द्रता के कारण रोग का प्रकोप बढ़ सकता है।

फफूंद के बीजाणु हवा और सिंचाई के पानी के माध्यम से भी फैल सकते हैं।

लक्षण

करनाल बंट के लक्षण सामान्यतः दाने बनने के बाद दिखाई देते हैं।

संक्रमित बाली में केवल कुछ दाने प्रभावित होते हैं।

एक दाने का पूरा हिस्सा नष्ट होने के बजाय अक्सर उसका कुछ भाग काला या भूरा हो जाता है।

संक्रमित भाग में काला चूर्ण बनता है जिसमें बड़ी संख्या में फफूंदीय बीजाणु होते हैं।

गंभीर संक्रमण में दाने सिकुड़े हुए और विकृत दिखाई दे सकते हैं।

संक्रमित दानों से कई बार सड़ी हुई मछली जैसी अप्रिय गंध आ सकती है। यह गंध रोग पहचानने में महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है।

निदान

करनाल बंट को खुली कंडुआ से अलग पहचानना आवश्यक है।

खुली कंडुआ में पूरी बाली के दाने काले चूर्ण में बदल सकते हैं, जबकि करनाल बंट में केवल कुछ दानों का कुछ हिस्सा प्रभावित होता है।

दाने को काटकर देखने पर काले बीजाणुयुक्त भाग स्पष्ट दिखाई दे सकता है।

यदि रोग की सही पहचान आवश्यक हो, विशेषकर बीज उत्पादन या व्यापार के लिए, तो प्रयोगशाला जांच कराना बेहतर होता है।

उपाय

रोगमुक्त और प्रमाणित बीज का उपयोग करें।

करनाल बंट के इतिहास वाले खेतों से बीज रखने से बचें।

रोगरोधी या कम संवेदनशील गेहूं किस्मों का चयन करें।

समय पर बुवाई करें ताकि फूल आने की अवस्था अत्यधिक नम और अनुकूल मौसम से मेल न खाए।

खेत में अत्यधिक सिंचाई से बचें, विशेष रूप से बाली निकलने और फूल आने के समय यदि मौसम पहले से नम हो।

संक्रमित अनाज को स्वस्थ बीज में न मिलाएं।

फसल चक्र अपनाना भी मिट्टी में रोगजनक की मात्रा धीरे-धीरे कम करने में सहायक हो सकता है।

कुछ क्षेत्रों में फूल आने की अवस्था के आसपास अनुशंसित फफूंदनाशी का उपयोग किया जाता है, लेकिन यह निर्णय स्थानीय रोग पूर्वानुमान और कृषि विभाग की सलाह के आधार पर लेना चाहिए।

करनाल बंट में रोकथाम सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि संक्रमित दानों से अनाज की बाजार गुणवत्ता प्रभावित होती है।