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धान

धान का टंग्रो रोग

धान का टंग्रो रोग एक महत्वपूर्ण विषाणुजनित रोग है। इसकी खास बात यह है कि यह सामान्यतः एक पौधे से दूसरे पौधे तक सीधे नहीं फैलता, बल्कि हरे पत्ती फुदका यानी ग्रीन लीफहॉपर जैसे वाहक कीटों द्वारा फैलाया जाता है। प्रारंभिक अवस्था में संक्रमण होने पर पौधों की वृद्धि और उत्पादन काफी प्रभावित हो सकता है।

धान का टंग्रो रोग एक महत्वपूर्ण विषाणुजनित रोग है। इसकी खास बात यह है कि यह सामान्यतः एक पौधे से दूसरे पौधे तक सीधे नहीं फैलता, बल्कि हरे पत्ती फुदका यानी ग्रीन लीफहॉपर जैसे वाहक कीटों द्वारा फैलाया जाता है। प्रारंभिक अवस्था में संक्रमण होने पर पौधों की वृद्धि और उत्पादन काफी प्रभावित हो सकता है।

कारण

धान का टंग्रो रोग वायरस के संक्रमण से संबंधित है। इसके रोग-समूह में मुख्य रूप से Rice Tungro Bacilliform Virus और Rice Tungro Spherical Virus की भूमिका होती है।

ये वायरस संक्रमित पौधे से स्वस्थ पौधे तक मुख्य रूप से हरे पत्ती फुदका द्वारा पहुंचते हैं। कीट संक्रमित पौधे का रस चूसने के बाद स्वस्थ पौधे पर भोजन करता है और वायरस का प्रसार हो सकता है।

पुरानी संक्रमित फसल, स्वयं उगे धान के पौधे और कुछ आसपास के पौधे वायरस तथा वाहक कीट के लिए स्रोत बन सकते हैं।

लक्षण

संक्रमित पौधों की वृद्धि सामान्य पौधों की तुलना में धीमी हो जाती है और पौधे बौने दिखाई देने लगते हैं।

पत्तियों का रंग हल्के पीले से नारंगी-पीले तक बदल सकता है। रंग परिवर्तन अक्सर पत्ती की नोक से शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ता है।

प्रभावित पौधों में कल्लों की संख्या कम हो सकती है। पत्तियां छोटी और सीधी रह सकती हैं।

यदि संक्रमण प्रारंभिक अवस्था में हो तो बाली निकलने में देरी हो सकती है और उपज काफी प्रभावित हो सकती है।

देर से संक्रमित पौधे कुछ हद तक सामान्य वृद्धि कर सकते हैं, लेकिन बालियों में दानों का भराव कमजोर रह सकता है।

खेत में रोग कई बार अलग-अलग छोटे समूह या पैच के रूप में दिखाई देता है क्योंकि वाहक कीट संक्रमित क्षेत्र से पास के पौधों तक वायरस फैलाता है।

निदान

सिर्फ पत्तियों का पीला होना टंग्रो की पुष्टि नहीं करता। नाइट्रोजन या जिंक की कमी में भी पौधे पीले दिखाई दे सकते हैं।

टंग्रो में पत्तियों के पीले-नारंगी होने के साथ पौधे का बौनापन, कम कल्ले और असमान वृद्धि महत्वपूर्ण संकेत हैं।

यदि खेत में ग्रीन लीफहॉपर की उपस्थिति भी दिखाई दे और रोग पैच के रूप में फैल रहा हो तो टंग्रो की संभावना बढ़ जाती है।

पोषक तत्व की कमी और वायरस संक्रमण के बीच सही अंतर के लिए आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ या प्रयोगशाला की सहायता लें।

उपाय

टंग्रो का सीधा उपचार करने वाली कोई सामान्य "वायरस मारने वाली" खेत की दवा नहीं होती। इसलिए रोग का प्रबंधन मुख्य रूप से रोकथाम, संक्रमित पौधों के स्रोत को कम करने और वाहक कीट के प्रबंधन पर आधारित होता है।

जहां उपलब्ध हों वहां टंग्रो के प्रति सहनशील या प्रतिरोधी धान किस्में लगाएं। ICAR के धान अनुसंधान कार्यक्रमों में टंग्रो प्रतिरोधी या सहनशील प्रविष्टियों की पहचान की गई है।

स्वस्थ नर्सरी तैयार करें और संक्रमित पौधों को पहचानते ही खेत से निकालकर उचित तरीके से नष्ट करें।

एक क्षेत्र में धान की बुवाई या रोपाई का समय बहुत अधिक अलग-अलग रखने से लगातार हरी फसल उपलब्ध रहती है, जिससे वाहक कीट और वायरस को बने रहने का अवसर मिल सकता है। इसलिए स्थानीय स्तर पर अनुशंसित रोपाई अवधि का पालन करें।

खेत और मेड़ों पर स्वयं उगे पुराने धान के पौधों तथा अनावश्यक खरपतवारों को हटाएं।

ग्रीन लीफहॉपर की नियमित निगरानी करें। कीट की संख्या आर्थिक नुकसान की सीमा तक पहुंचने पर केवल स्थानीय कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित पंजीकृत कीटनाशी का प्रयोग करें।

इस रोग में सबसे प्रभावी रणनीति है—स्वस्थ पौध सामग्री, प्रतिरोधी किस्म, वाहक कीट की निगरानी और संक्रमित पौधों को शुरुआती अवस्था में हटाना।