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चना

चना का उकठा रोग

चना का उकठा रोग, जिसे फ्यूजेरियम विल्ट भी कहा जाता है, चने की सबसे गंभीर मिट्टीजनित बीमारियों में से एक है। यह पौधे को अंकुर अवस्था से लेकर फूल और फली बनने तक प्रभावित कर सकता है। रोग का प्रकोप अधिक होने पर खेत में अलग-अलग स्थानों पर पौधे अचानक मुरझाकर सूखने लगते हैं। संक्रमित पौधा अक्सर बाहर से बिना किसी बड़े पत्ती धब्बे के सूख जाता है, इसलिए किसान इसे कई बार पानी की कमी समझ लेते हैं। ICAR-IIPR के चना सुधार कार्यक्रम में उकठा प्रतिरोध को एक महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है।

चना का उकठा रोग, जिसे फ्यूजेरियम विल्ट भी कहा जाता है, चने की सबसे गंभीर मिट्टीजनित बीमारियों में से एक है। यह पौधे को अंकुर अवस्था से लेकर फूल और फली बनने तक प्रभावित कर सकता है। रोग का प्रकोप अधिक होने पर खेत में अलग-अलग स्थानों पर पौधे अचानक मुरझाकर सूखने लगते हैं। संक्रमित पौधा अक्सर बाहर से बिना किसी बड़े पत्ती धब्बे के सूख जाता है, इसलिए किसान इसे कई बार पानी की कमी समझ लेते हैं। ICAR-IIPR के चना सुधार कार्यक्रम में उकठा प्रतिरोध को एक महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है।

कारण

यह रोग मुख्य रूप से Fusarium oxysporum f. sp. ciceri नामक फफूंद के कारण होता है।

यह रोगजनक मिट्टी में कई वर्षों तक जीवित रह सकता है। संक्रमित जड़ और पुराने रोगग्रस्त फसल अवशेष इसके प्रमुख स्रोत होते हैं।

फफूंद पौधे की जड़ों में प्रवेश करती है और धीरे-धीरे पौधे की जलवाहक नलिकाओं यानी जाइलम को प्रभावित करती है। इससे जड़ों से पत्तियों तक पानी का सामान्य प्रवाह बाधित हो जाता है और पौधा मुरझाने लगता है।

लगातार एक ही खेत में चना उगाना, संक्रमित मिट्टी, संवेदनशील किस्मों का उपयोग और रोगग्रस्त खेत से प्राप्त बीज रोग के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

मध्यम से गर्म मिट्टी के तापमान में रोग तेजी से विकसित हो सकता है।

लक्षण

उकठा रोग दो अवस्थाओं में दिखाई दे सकता है—जल्दी उकठा और देर से उकठा।

कम उम्र के पौधों में संक्रमण होने पर पौधे तेजी से मुरझाकर सूख सकते हैं। ऐसी स्थिति में खेत में पौध संख्या कम हो जाती है।

बड़े पौधों में शुरुआत में एक या कुछ शाखाओं की पत्तियां मुरझाने लगती हैं। बाद में पूरा पौधा प्रभावित हो जाता है।

पत्तियां पीली होकर नीचे झुक जाती हैं और पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सूखी पत्तियां कई बार पौधे पर ही लगी रहती हैं।

रोगग्रस्त पौधे की मुख्य जड़ को काटकर देखने पर अंदर की संवहनी नलिकाओं में भूरा या गहरा भूरा रंग दिखाई दे सकता है।

अक्सर खेत में रोग गोल या अनियमित पैच में दिखाई देता है।

निदान

उकठा की पहचान के लिए मुरझाए पौधे को जड़ सहित निकालें।

जड़ और तने के निचले हिस्से को लंबाई में काटकर देखें। यदि अंदर जलवाहक ऊतक भूरे रंग के दिखाई दें तो फ्यूजेरियम विल्ट की संभावना मजबूत होती है।

इसे सूखी जड़ सड़न से अलग पहचानना जरूरी है। उकठा में जड़ें सामान्यतः पूरी तरह सूखी और भुरभुरी नहीं होतीं, जबकि सूखी जड़ सड़न में जड़ का बाहरी भाग आसानी से उतर सकता है और जड़ों पर छोटे काले फफूंदीय कण दिखाई दे सकते हैं।

पानी की कमी में खेत के अधिकांश पौधे समान रूप से मुरझाते हैं, जबकि उकठा अक्सर पैच में दिखाई देता है।

उपाय

उकठा प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। ICAR-IIPR ने DCP 92-3, IPC 2004-98 और कई अन्य चना किस्मों में उकठा प्रतिरोध दर्ज किया है। किस्म का चयन स्थानीय कृषि-जलवायु क्षेत्र के अनुसार करें।

स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें।

रोग के इतिहास वाले खेत में चना लगातार न लगाएं। अनाज वाली गैर-मेजबान फसलों के साथ फसल चक्र अपनाना उपयोगी है।

बीज उपचार के लिए स्थानीय कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित पंजीकृत फफूंदनाशी या Trichoderma आधारित जैव एजेंट का उपयोग किया जा सकता है।

रोगग्रस्त पौधों को जड़ सहित निकालकर खेत से बाहर नष्ट करें।

खेत में अच्छा जल निकास रखें तथा मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने का प्रयास करें।

उकठा रोग में पौधा संक्रमित होने के बाद फफूंदनाशी छिड़काव से पूर्ण नियंत्रण कठिन होता है। इसलिए प्रतिरोधी किस्म, स्वस्थ बीज, बीज उपचार और फसल चक्र इसका सबसे प्रभावी प्रबंधन है।