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बाजरा

बाजरा का कंडुआ रोग

बाजरा का कंडुआ रोग, जिसे स्मट रोग भी कहा जाता है, मुख्य रूप से बाली में बनने वाले दानों को प्रभावित करता है। संक्रमित फूल में सामान्य बाजरा दाना बनने के बजाय फफूंद के बीजाणुओं से भरी एक असामान्य संरचना बन जाती है। अधिक संक्रमण होने पर दानों की संख्या कम होती है तथा फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। बाजरा में कंडुआ को भारत में आर्थिक महत्व के रोगों में माना जाता है और ICAR के बाजरा सुधार कार्यक्रमों में इसके प्रति प्रतिरोध की भी जांच की जाती है।

बाजरा का कंडुआ रोग, जिसे स्मट रोग भी कहा जाता है, मुख्य रूप से बाली में बनने वाले दानों को प्रभावित करता है। संक्रमित फूल में सामान्य बाजरा दाना बनने के बजाय फफूंद के बीजाणुओं से भरी एक असामान्य संरचना बन जाती है। अधिक संक्रमण होने पर दानों की संख्या कम होती है तथा फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। बाजरा में कंडुआ को भारत में आर्थिक महत्व के रोगों में माना जाता है और ICAR के बाजरा सुधार कार्यक्रमों में इसके प्रति प्रतिरोध की भी जांच की जाती है।

कारण

बाजरा का कंडुआ मुख्य रूप से Moesziomyces penicillariae से संबंधित फफूंद के कारण होता है। पुराने कृषि साहित्य में इसे Tolyposporium penicillariae नाम से भी लिखा गया है।

रोग का संक्रमण सामान्यतः फूल आने के समय होता है। फफूंद के बीजाणु हवा या संक्रमित पौध सामग्री के माध्यम से संवेदनशील फूलों तक पहुंचते हैं।

संक्रमण के बाद सामान्य दाने का विकास बाधित होता है और उसकी जगह बीजाणुओं से भरी स्मट संरचना बनने लगती है।

संक्रमित बालियों और खेत में बचे रोगग्रस्त अवशेषों से रोगजनक अगले मौसम तक बना रह सकता है।

फूल आने के आसपास नम मौसम, वर्षा और अधिक आर्द्रता कुछ परिस्थितियों में संक्रमण के लिए अनुकूल हो सकते हैं।

लक्षण

कंडुआ रोग के लक्षण मुख्य रूप से बाली बनने और दाने विकसित होने के दौरान स्पष्ट होते हैं।

शुरुआत में संक्रमित दाना सामान्य दाने की तुलना में आकार में बड़ा और कुछ हद तक सूजा हुआ दिखाई दे सकता है।

संक्रमित दाने की जगह अंडाकार या गोलाकार थैली जैसी संरचना बनती है। शुरू में इसका रंग हरा या हल्का होता है।

जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, यह संरचना भूरे या गहरे रंग की होने लगती है।

इसके अंदर बड़ी मात्रा में गहरे भूरे से काले रंग के फफूंदीय बीजाणु विकसित होते हैं।

परिपक्व अवस्था में बाहरी आवरण फट सकता है और अंदर का काला बीजाणु चूर्ण बाहर निकलकर आसपास फैल सकता है।

एक बाली में सभी दाने संक्रमित होना जरूरी नहीं है। कई बार स्वस्थ दानों के बीच कुछ ही दाने स्मट संरचनाओं में बदले दिखाई देते हैं।

गंभीर संक्रमण होने पर संक्रमित दानों की संख्या बढ़ने से वास्तविक अनाज उत्पादन में कमी आ सकती है।

निदान

कंडुआ को पहचानने के लिए दाना बनने की अवस्था में बालियों का निरीक्षण करें।

यदि सामान्य दाने की जगह अपेक्षाकृत बड़ी, फूली हुई और बाद में काले चूर्ण से भरी संरचना दिखाई दे रही है तो कंडुआ रोग की संभावना अधिक है।

कंडुआ और अर्गट के बीच अंतर पहचानना महत्वपूर्ण है।

अर्गट में शुरुआत में चिपचिपा हनीड्यू निकलता है और बाद में लंबा, कठोर तथा ठोस स्क्लेरोशियम बनता है। इसके विपरीत कंडुआ में प्रभावित दाने के अंदर सूखा काला बीजाणु चूर्ण पाया जाता है।

उपाय

रोग नियंत्रण की शुरुआत स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज से करें। अधिक रोगग्रस्त खेत से प्राप्त बाजरा को अगले वर्ष बीज के रूप में उपयोग न करना बेहतर है।

रोग प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों और संकरों का उपयोग अत्यंत उपयोगी है। ICAR के अनुसार बाजरा में स्मट, अर्गट और ब्लास्ट सहित कई रोगों के प्रति प्रतिरोधी प्रविष्टियां विकसित और पहचानी गई हैं।

फसल में संक्रमित बालियां दिखाई देने पर बीजाणु फैलने से पहले उन्हें सावधानी से काटकर एक थैले में एकत्र करें और खेत से बाहर नष्ट करें। ICAR की मिलेट रोग प्रबंधन सलाह भी स्मट से प्रभावित बालियों को हटाकर नष्ट करने को रोगजनक स्रोत कम करने का उपयोगी तरीका बताती है।

कटाई के बाद संक्रमित बालियों और पौध अवशेषों का उचित प्रबंधन करें। खेत तथा मेड़ों पर स्वयं उगे बाजरा के पौधे भी हटा दें।

गहरी गर्मी की जुताई तथा फसल चक्र अपनाने से खेत में रोगजनक के स्रोत कम करने में सहायता मिल सकती है।

बीज उत्पादन वाले खेतों में फूल आने से लेकर दाना बनने तक बार-बार निरीक्षण करें और संक्रमित पौधों को समय रहते हटा दें।

यदि किसी क्षेत्र में रोग का नियमित और गंभीर प्रकोप होता है तो स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग द्वारा बाजरा कंडुआ के लिए अनुशंसित बीज उपचार अथवा अन्य पंजीकृत नियंत्रण उपाय अपनाएं। किसी भी रसायन की मात्रा वर्तमान उत्पाद लेबल के अनुसार ही रखें।